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समर्पण: एक सच्चे शिष्य की पहचान और ज्ञान की कुंजी

स्टोरी: गांव के एक छोटे से कस्बे में सत्या नामक एक युवक रहता था। वह एक साधारण किसान का बेटा था, लेकिन उसके मन में ज्ञान की प्यास थी। एक दिन, उसने सुना कि पास के आश्रम में एक महान गुरु जी आए हैं। उन्होंने जीवन के गूढ़ रहस्यों और आत्म-साक्षात्कार पर व्याख्यान देना शुरू किया है।

सत्या का मन बहुत व्याकुल हो उठा। वह गुरु जी के पास गया और उनके चरणों में गिरकर बोला, ‘गुरुजी, मुझे अपना शिष्य बना लीजिए। मुझे ज्ञान की ज्योति चाहिए।’

गुरुजी ने उसे अपनाया और उसे शिक्षा देनी शुरू की। सत्या ने गुरुजी के हर शब्द को अपने जीवन में उतार लिया। समय बीतता गया। सत्या ने शिक्षा में निपुणता हासिल कर ली। वह भी अब एक महान विद्वान बन चुका था।

एक दिन, गांव में एक बड़ा समारोह आयोजित किया गया। उस समारोह में गुरुजी और सत्या दोनों को सम्मानित किया गया। लोगों ने सत्या की विद्वता की प्रशंसा की। धीरे-धीरे लोग गुरुजी को भूलने लगे और सत्या को उनका स्थान देने लगे।

सत्या को यह देखकर तकलीफ होने लगी। उसने सोचा, ‘मैंने ज्ञान तो प्राप्त कर लिया है, लेकिन क्या मैंने समर्पण को भी भुला दिया?’

उसने उसी क्षण निर्णय लिया कि वह हमेशा अपने गुरुजी के चरणों में रहेगा। चाहे वह कितना भी बड़ा विद्वान क्यों न बन जाए, उसका समर्पण उसके गुरु के प्रति सदा अडिग रहेगा।

समारोह के बाद, सत्या ने गुरुजी के चरणों में जाकर हाथ जोड़ कर कहा, ‘गुरुजी, लोग मुझे आज आपका स्थान देने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मैं आपको वचन देता हूँ कि मैं आपका शिष्य हूँ और सदा रहूँगा।’

गुरुजी ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘समर्पण सच्चे ज्ञान का प्रतीक है।
आज तूने सिद्ध कर दिया कि तू केवल विद्वान नहीं, बल्कि सच्चा शिष्य है।’

सत्या ने गुरुजी के चरणों में अपना मस्तक रख दिया।

समर्पण का भाव वही समझ सकता है, जो सच्चा शिष्य बनना जानता है।
वह शिष्य कोई और नही कमला मोटर्स का मैनेजर सत्या चंद्रकार था।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा लेना चाहिए की जीवन में कितनी भी ऊंचाइयों में पहुंच जाओ लेकिन जीवन में समर्पण की भावना हमारे दिलों दिमाग में पल – पल में व्याप्त होना चाहिए ताकि हमारी इस समर्पण की भावना से आने वाली पीढ़ी के संस्कार मे समर्पण के फूल खील सके।

लेखक
कैलाश जैन बरमेचा

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