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प्रजापिता ब्रह्मा कुमारीज़ ईश्वरीय विश्व विद्यालय में रजत जयंती समारोह

दुर्ग। विगत 25 वर्षों से डॉ. शिरोमणि माथुर के निवास चिखलकसा में प्रजापिता ब्रह्मा कुमारीज़ ईश्वरीय विश्व विद्यालय की एक शाखा गीता पाठशाला संचालित है। इस गीता पाठशाला का रजत जयंती समारोह बड़े ही धूमधाम व आध्यात्मिक वातावरण में ज्ञानांजली युक्त दल्ली राजहरा में मनाया गया। कार्यक्रम में प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्व विद्यालय के स्थानीय भाई बहन बड़ी संख्या में शामिल हुये।

सर्वप्रथम 3 मिनट का मौन रखकर ईश्वरीय योग लगाया गया फिर 25 वर्षों की खुशी में केक काटा गया। केक काटने के पश्चात गीता पाठशाला कई ओर से माता डॉ.शिरोमणि माथुर,श्रीमती बसंती पटेल ,श्रीमती इसरावती जयसवाल,श्यामा माता,अंजलि दीदी, व सुमित्रा दीदी ने संस्था की तीनों तपस्वी बहन पूर्णिमा बहन, स्वर्णा बहन व आभा बहन को शॉल श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया तथा स्मृति चिन्ह भी दिये। पूर्णिमा बहन जी ने पुष्प गुच्छ व बाबा का चित्र लगी घड़ी गीता पाठशाला हेतु देकर सभी माताओं व बहनों का सम्मान किया। इसी अवसर पर शारदा बहन ने माताओं व बहनों को श्रीफल व पुष्प गुच्छ देकर सम्मानित किया।

संस्था के वरिष्ठ भाई गोपेश सोनवानी ने गीत गाकर माहौल आध्यात्मिकता व संगीत से मधुर व मोहक बना दिया। बाबा का घर मधुर संगीत व प्रकाश से भरपूर रहा। गीत के बोल थे – लोहे का जिगर रखती है,साहित्य की डगर पर कलम के कदमों से जो चलती है,स्नेह और ममता की है मूरत,इस नगर को है आपकी जरूरत,साहित्य जगत में आप प्रभु के वरदान है,नारी शक्ति की आप पहचान है।

इस अवसर पर गीता पाठशाला की संचालिका डॉ. शिरोमणि माथुर ने 25 वर्षों की लंबी यात्रा को याद करते हुए उन भाई बहनों को भी याद किया जो कही अन्यत्र चले गए और कुछ दुनियां छोड़कर सदा के लिए विदाई ले गए। उन्होंने कहा कि इन 25 वर्षों में कई उतार – चढ़ाव आये परन्तु गीता पाठशाला को बाबा ने चलाये रखा। करोना काल में जब आने जाने पर पाबंदी थी तब कुछ दिनों बंद रही,बाकी बहनों का उत्साह बराबर बना रहा और वे बाबा की मुरली सुनने, ज्ञानार्जन करने व योग लगाने के लिये बराबर आती रही। उनका सहयोग सदा याद रहेगा।

उन्होंने कहा बाबा के ज्ञान को समझ कर हम अपने जीवन व संसार के रहस्यों को गंभीरता से समझ सकते है। हम देवताओं की पूजा तो करते है परन्तु यह देवता कब इस धारा पर आये और कैसे यह देवता बने या नारायण और ब्रह्मा कैसे बने यह भी समझना चाहिये। आत्म परमात्मा का जान, कर्मों की गति, सृष्टिचक्र क्या है,हम इस धारा पर कब आते है क्यों आते है और कब वापस जाना है यह भी समझ ले तो हमारा भाग्य बनता है। कर्म तो सभी करते है, कर्म भी खेती की तरह है आप खेत में कोदो कुटकी या धान बोते है या आम की फसल लगाते है,जैसा हम कर्म करते है वैसा फल मिलता है। यह ज्ञान बाबा के श्री मुख से निकले हुए महावाक्य है जिनसे 21 जन्मों का भाग्य बनता है।

इस कार्यक्रम में नेहरू स्कूल के प्राचार्य ब्रह्माकुमार भाई रानाडे सर, गोपेश सोनवानी,पवन साहू, ईश्वर भाई, डॉ. विनोद भाई,आशुतोष माथुर, प्रदीप भाई(अड़जाल) ,मनोज पाटिल,मनोज दास,जगप्रसाद,सेवाराम साहू भाई,भोजराम साहू,निलेश श्रीवास्तव,रामेश्वर मांडवी, पुनाराम साहू,श्यामा माता,निधि गुप्ता,सोनल गुप्ता,निरुपमा माथुर,अनादि माथुर,शारदा बहन,नेहा जयसवाल,गुंजन पटेल,ममता मंडावी,ममता पंडागरे, राजेंदर कौर,संतोषी,लता,संगीता बहन,सरजा बहन, तिलोत्तमा बहन,तारिणी,गीता सिंह, अनीसा बहन के अतिरिक्त डौंडी व अड़जाल से भी बड़ी संख्या में भाई बहन इस कार्यक्रम में भाग लेने आये और सभी ने इस आध्यात्मिक कार्यक्रम में भाग लेकर आत्मिक शांति व सुख की अनुभूति की। सभी भाई बहनों को बाबा के घर से कापी व पेन की सौगात भी दी गई। सभी भाई बहनों ने बाबा के घर में भोग स्वरूप भोजन ग्रहण किया।ऐसे कार्यक्रम से नगर में आध्यात्मिकता बनता है। इस समय विश्व का वातावरण तनावग्रस्त है ऐसे में ऐसे कार्यक्रम सुकून देते है।

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